स्वप्नदोष | Wet Dreams Full Detail

स्वप्नदोष: लक्षण-शरीर में विजातीय द्रव्य की उपस्थिति के कारण जब शरीर के स्नायु-जाल में विकार उत्पन्न हो जाता है तो पुरूष विवाहित हो या अविवाहित, उसको स्वप्न में या जाग्रत अवस्था में भी वीर्यपात हो जाया करता है।

महीने में तीन-चार बार स्वप्नदोष का होना, यदि उसके फलस्वरूप सिर में पीड़ा और बदन में सुस्ती न आवे तो विशेष चिन्ता का विषय न होना चाहिये। परन्तु इसको अधिक बार स्वप्नदोष होना निश्चय ही इस बात का सूचक है कि शरीर का नाड़ी-जाल विजातीय द्रव्य के भार से बुरी तरह आक्रान्त है जिसे यदि शीघ्र निर्मल न किया जायेगा तो शरीर में स्वप्नदोष से भी अधिक भयानक रोगों के उत्पन्न हो जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हो जायेगी।

चिकित्सा- स्वप्नदोष-रोग की चिकित्सा आरम्भ करने के पहले रोगी को कम से कम 24 घंटे का उपवास कागजी नींबू का रस मिले जल पर रहकर करना चाहिये। उसके बाद दो-तीन दिनों तक फलों के जूस पर रहना चाहिये। उपवास और रसाहार पर रहने के दिनों में दोनों वक्त एनिमा लेना जरूरी है। तत्पश्चात् एक सप्ताह तक सुबह को धारोष्ण

– गाय का दूध और फल तथा शाम को उबली शाक सब्जियां और सलाद ले। शाम का भोजन हल्का होना चाहिये और सूर्यास्त के पहले ही लेना चाहिये। इन दिनों जब कभी कब्ज रहे, एनिमा लेकर पेट साफ कर लेना चाहिये। उसके बाद सुबह को फल और दूध तथा शाम को चोकर समेत आटे की रोटी, एक-दो प्रकार की उबली शाक-सब्जी तथा सलाद लें। जब से फल-दूध का भोजन आरम्भ किया जाये तब से प्रतिदिन नियमपूर्वक ठीक समय पर नीचे का उपचार-कम चलाना चाहिये

5 बजे सुबह शौचादि से निपट लेने के बाद पेडू तथा जननेन्द्रिय पर मिट्टी की पट्टी 30-45 मिनट तक लगाने के बाद 10 मिनट तक कटि-स्नान करें। 3 बजे दिन को पहले दिन रीढ़ की गीली पट्टी 30 मिनट तक या नींद आ जाने पर नींद खुलने तक दें, तथा दूसरे दिन 10 मिनट तक मेहन-स्नान करे। इसी प्रकार कुछ दिनों तक करें। रात को सोते समय कमर की गीली पट्टी लगाकर सोये या पेडू पर मिट्टी की पट्टी रखकर ।

आसमानी या हल्के नीले रंग की बोतल के सूर्य तप्त जल की 50-50 ग्राम की चार खुराकें दिन में पिये तथा 9 बजे रात को सोने से पहले उसी रंग की बोतल में तैयार किये हुए तेल की मालिश मेरूदण्ड के निचले हिस्से पर,

सिर के पिछले हिस्से पर तथा हृदय पर 5 मिनट तक करें। जननेन्द्रिय को 5 मिनट तक उसके बाद अण्डकोष तथा किसी ठंडे पानी से भरे बर्तन में रखे, फिर निकाल कर पौंछ डाले और पैरों को घुटनों तक, बाहों को कुहनियों तक, गले के पिछले भाग को तथा नाभि को ठंडे पानी से अच्छी तरह पौंछ डाले। सबके बाद एक गिलास गरम पानी में आधा कागजी नींबू का रस निचोड़ कर पीजिये और दाहिनी करवट लेट जाये। चित्त लेटकर कभी न सोये। रात को जब नींद उचट जाये तो उठकर ठंडे जल से भीगी तौलिया से समस्त शरीर को पौंछ डाले और पुनः सो जाये

साधारण स्नान के समय कम से कम 5 मिनट तक गर्दन के पीछे तथा रीढ़ पर ठंडे जल की धार गिरने देना चाहिये।

सुबह या शाम को शीर्षासन, सर्वांगासन, धनुरासन तथा भुजंगासन इस रोग में बड़ा लाभ करते हैं। दिन में दो-तीन । बार गहरी श्वांस की कसरतें करना भी इस रोग में बहुत जरूरी है।

1 शुक्रप्रमेह, शीघ्रपतन तथा शिश्न लक्षण- नाभिचक्र से वीर्य जिस समय प्रमेहा-नाड़ी से होकर अण्डकोप की ओर आता है तो वह अण्डकोष में एकत्र होने के बजाय जब मूत्रेन्द्रिय से बाहर आने लगता है तो इस अवस्था को रोगावस्था समझना चाहिये। वीर्य जब स्वप्नावस्था में बाहर आता है तो वह स्वप्नदोष कहलाता है, और जब जागृत अवस्था में पेशाब के साथ बाहर आता है तो उसे प्रमेह या शुक्रप्रमेह कहते हैं। शुक्र प्रमेह को उर्दू में जरियानमनी कहा जाता है। इस रोग में वीर्य बिना इच्छा के, बिना किसी उत्तेजना के, या अल्प उत्तेजना से पेशाब-पाखाना करते समय जोर लगाने से, स्त्री को देखने मात्र से, नंगी तस्वीर, कामोत्तेजक साहित्य पढ़ने से, तथा घोड़े आदि की सवारी करने से ही, पतला होकर अपने आप मूत्रेन्द्रिय के रास्ते गिरता है।

शीघ्र पतन को उर्दू में सुरअत अंजाल और अंग्रेजी में Low retention, Rapid ejaculation, a Premature ejaculation कहते हैं। इसमें पुरूष मैथुन के समय बहुत जल्द अथवा स्त्री के स्खलित होने से पहले ही स्खलित हो जाता है जिससे मैथुन का मन्तव्य पूरा-पूरा हल नहीं होने पाता। वीर्य का पतला होना भी एक दोष है। इसको उर्दू में

रिक्कतमनी कहते हैं।

मैथुन के समय शिश्न का कड़ा न पड़ना एक बहुत बड़ा दोष है। क्योंकि ढीले और सुस्त शिश्न से मैथुन किया

दृढ़ सम्पन्न ही नहीं हो सकती। इस रोग में नुकसानबाह या जोफवाह कहते हैं। इसमें शिश्न योनि के भीतर प्रवेश करने के बाद उसकी गर्मी से दृढ़ होता है, या स्खलन के पहले ही बिना कारण के ढीला पड़ जाता है, या पूरी तौर से और सख्त नहीं होता, या योनि के भीतर प्रवेश करने के पूर्व ही स्खलित हो जाता है, या बहुत कोशिश करने और धक्का आदि देने के बाद स्खलित होता है।

जननेन्द्रिय से सम्बन्ध रखने वाला एक और रोग है। उसमें वीर्य के निकलने के पहले एक प्रकार का स्राव जिसको उर्दू में मजी कहते हैं, निकलकर रास्ते को चिकना करता है, वह स्राव निकलना बंद हो जाता है जिससे धक्के के साथ वीर्य निकलते समय मूत्र-नलिका को क्षति पहुंचने की सम्भावना रहती है।

उपर्युक्त सभी रोगों के कारण, अस्वाभाविक इन्द्रिय-सुख अत्यधिक स्वाभाविक इन्द्रिय-सुख, पुराना सुजाक, कृमिरोग, कब्ज, (कोष्ठबद्धता), शरीर में विजातीय द्रव्य की उपस्थिति, तथा असंयमी जीवन है। 1

आजकल 99 प्रतिशत मर्दो में ये रोग पाये जाते हैं। इन रोगों से आक्रान्त रोगी अपनी स्त्रियों को मैथुन में संतोष से नहीं प्रदान कर सकते जिसकी वजह से स्त्रियों के सामने बड़ी भद्द होती है जिससे वे मारे शरम के गड़ जाते हैं। मैथुन सम्बन्धी इस आतृप्ति के कारण स्त्रियां प्रायः कितनी ही योनि-सम्बन्धी बीमारियों का शिकार होकर अपने जीवन से ही निराश हो जाती हैं ।

चिकित्सा

एक से तीन दिन का उपवास। फिर कब्ज टूटने तक रसाहार, और फलाहार साथ में सुबह-शाम गुनगुने तत्पश्चात ठंडे पानी का एनिमा। उसके बाद दिन में दो बार ठंडे पानी का कटि-स्नान 20-20 मिनट और तीसरी बार सोने से आध घंटा पहले गुनगुने पानी का कटि-स्नान, 10-15 मिनट तक । प्रतिदिन रात भर के लिए जननेन्द्रिय और पेडू पर मिट्टी की पट्टी या भीगी कमर पट्टी। प्रति दूसरे दिन पूरे शरीर पर भीगी चादर की लपेट कुछ दिनों तक। गर्मियों में दिन में दो बार ठंडे पानी से साधारण स्नान तथा

स्नान करते वक्त 5 मिनट तक पानी की धार को मेरूदण्ड पर पड़ने देना। बढ़े रोग में सोते समय गर्दन के नीचे बर्फ की थैली रखकर सोना । कभी-कभी धूप स्नान । शक्ति भर हल्का, व्यायाम या सुबह-शाम शुद्ध वायु में टहलना। रोज हलासन आधा मिनट तक। हल्की नीली बोतल का सूर्यतप्त

एक से तीन दिन का उपवास। फिर कब्ज टूटने तक रसाहार, और फलाहार साथ में सुबह-शाम गुनगुने तत्पश्चात ठंडे पानी का एनिमा। उसके बाद दिन में दो बार ठंडे पानी का कटि-स्नान 20-20 मिनट और तीसरी बार सोने से आध घंटा पहले गुनगुने पानी का कटि-स्नान, 10-15 मिनट तक । प्रतिदिन रात भर के लिए जननेन्द्रिय और पेडू पर मिट्टी की पट्टी या भीगी कमर पट्टी। प्रति दूसरे दिन पूरे शरीर पर भीगी चादर की लपेट कुछ दिनों तक। गर्मियों में दिन में दो बार ठंडे पानी से साधारण स्नान तथा

स्नान करते वक्त 5 मिनट तक पानी की धार को मेरूदण्ड पर पड़ने देना। बढ़े रोग में सोते समय गर्दन के नीचे बर्फ की थैली रखकर सोना । कभी-कभी धूप स्नान । शक्ति भर हल्का, व्यायाम या सुबह-शाम शुद्ध वायु में टहलना। रोज हलासन आधा मिनट तक। हल्की नीली बोतल का सूर्यतप्त


जल दिन में 8 बार चना, अथवा गेहूं, सूखे मेवे, धारोष्ण कच्चा दूध, विटामिन ई, ए और बी वाले खाद्य पदार्थ, पालक, टमाटर तथा अनुत्तेजक आहार विशेष रूप से लेना। रात को सोने से पहले अण्डकोष को 5 मिनट तक ठंडे पानी में रखना तथा नाभी, हाथ-मुंह तथा गर्दन को ठंडे पानी से धो पौंछकर इन्द्रिय पर लाल बोतल में तैयार किया हुआ सूर्य तप्त तेल दो-तीन मिनट तक मलकर तब सोना उपर्युक्त रोगों की अचूक और मूली की जड़ एक माशा, पान के साथ सुबह-शाम या उस की जड़ का एक माशा चूर्ण शाम को भिगोकर और सुबह को छानकर पीना, उपर्युक्त रोगों में बड़ा लाभकारी होता है।

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